Udaipur Water Crisis: राजस्थान की झीलों की नगरी उदयपुर में एक तरफ आम लोगों को पानी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ होटल और रिसॉर्ट्स के स्विमिंग पूल में हर दिन लाखों लीटर पानी खर्च हो रहा है। शहर में जल संकट के बीच सामने आए आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। दावा है कि उदयपुर और आसपास के करीब 2000 होटलों के स्विमिंग पूल में प्रतिदिन औसतन एक करोड़ लीटर पानी खर्च हो रहा है। इतनी बड़ी मात्रा में पानी से करीब एक लाख लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है। भूजल के लगातार दोहन से शहर पर डार्क जोन में पहुंचने का खतरा भी मंडराने लगा है।
Udaipur Water Crisis: 2000 स्विमिंग पूल में खर्च हो रहा पानी
उदयपुर शहर और उसके आसपास के क्षेत्रों में करीब 3000 होटल और रिसॉर्ट संचालित हो रहे हैं। इनमें से लगभग 2000 होटल ऐसे हैं, जहां स्वीमिंग पूल की सुविधा उपलब्ध है। इन पूलों की क्षमता 50 हजार लीटर से लेकर 5 लाख लीटर तक बताई जा रही है।
यदि सभी पूलों की औसत क्षमता डेढ़ लाख लीटर मानी जाए तो इन्हें एक बार भरने के लिए करीब 30 करोड़ लीटर पानी की जरूरत होगी। यानी इन पूलों में पानी भरने के लिए बड़ी मात्रा में भूजल का इस्तेमाल किया जा रहा है।
होटलों में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए बनाए गए कई स्वीमिंग पूल छतों पर भी मौजूद हैं। इन्हें भरने के लिए पानी के साथ बिजली की भी खपत होती है।
हर दिन 1 करोड़ लीटर पानी की खपत
स्विमिंग पूल के रखरखाव और सफाई के लिए आमतौर पर महीने में एक बार पानी बदलने की बात सामने आई है। इसी आधार पर करीब 30 करोड़ लीटर पानी को 30 दिनों में बांटें तो प्रतिदिन औसतन 10 एमएलडी यानी एक करोड़ लीटर पानी की खपत होती है।
यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इतनी मात्रा में पानी उदयपुर की स्मार्ट सिटी परिधि के पुराने शहर के सभी 18 वार्डों में रहने वाली करीब एक लाख आबादी की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त बताया गया है।
एक तरफ आम नागरिकों को 72 घंटे के अंतराल पर पानी मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ निजी होटल और रिसॉर्ट्स में स्विमिंग पूल के लिए भूजल का इस्तेमाल जारी है। ऐसे में जल प्रबंधन और पानी के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
निजी ट्यूबवेल से निकाला जा रहा भूजल
होटल और रिसॉर्ट संचालक अपने स्वीमिंग पूल भरने के लिए निजी बोरवेल और ट्यूबवेल पर निर्भर हैं। इसके लिए सबमर्सिबल पंपों के माध्यम से लगातार भूजल निकाला जा रहा है।
इस तरह बड़े स्तर पर भूजल का इस्तेमाल होने से जमीन के नीचे मौजूद पानी के भंडार पर दबाव बढ़ने की आशंका है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस दोहन की निगरानी के लिए प्रभावी व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
यदि भूजल का इस्तेमाल इसी तरह जारी रहा तो आने वाले समय में जलस्तर और नीचे जा सकता है। इससे उदयपुर के डार्क जोन की श्रेणी में पहुंचने का खतरा बढ़ सकता है।
क्या स्विमिंग पूल पर लग सकती है अस्थायी रोक?
जल संकट के बीच होटल और रिसॉर्ट्स के स्विमिंग पूल के इस्तेमाल को नियंत्रित करने की मांग उठ रही है। पर्यटन उदयपुर की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन पानी की कमी के दौरान आम लोगों की जरूरतों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बताई जा रही है।
इसके लिए स्विमिंग पूल में पानी के रिसाइक्लिंग प्लांट अनिवार्य करने, सीधे भूजल से पूल भरने पर रोक लगाने और जल संकट के महीनों में इनके इस्तेमाल को सीमित करने जैसे सुझाव सामने आए हैं।
यदि प्रशासन इन सुझावों पर निर्णय लेता है तो पानी की खपत कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, फिलहाल स्विमिंग पूल के संचालन पर किसी अस्थायी रोक की आधिकारिक घोषणा की जानकारी सामने नहीं आई है।
जल संकट पर प्रशासन की क्या है जिम्मेदारी?
इस पूरे मामले में जलदाय विभाग और पर्यटन विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उपलब्ध प्रतिक्रिया के मुताबिक, जलदाय विभाग का कहना है कि उसका काम उपलब्ध पानी की आपूर्ति करना है, जबकि होटलों की निगरानी की जिम्मेदारी पर्यटन विभाग की है।
जल संकट को देखते हुए प्रशासन यदि सख्त कदम उठाता है तो भूजल के अत्यधिक दोहन को नियंत्रित किया जा सकता है।
अब सवाल यह है कि क्या उदयपुर में आम लोगों की पानी की जरूरत को देखते हुए होटल और रिसॉर्ट्स के स्विमिंग पूल के इस्तेमाल पर कोई नई गाइडलाइन जारी होगी? झीलों की नगरी में बढ़ती पानी की मांग के बीच प्रशासन का अगला कदम बेहद अहम माना जा रहा है।

