Supreme Court Collegium System: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल के आगामी संस्मरण Without Fear or Favour में किए गए खुलासों ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ दी है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इन प्रसंगों के आधार पर केंद्र सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। चर्चा का केंद्र न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकार की सहमति, कॉलेजियम की कार्यप्रणाली और महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई के लिए पीठ बदलने जैसे मुद्दे हैं।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब न्यायपालिका की संस्थागत स्वायत्तता और नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। हालांकि, संस्मरण में दर्ज आरोपों और संबंधित पक्षों की प्रतिक्रियाओं को अलग-अलग समझना जरूरी है।
जस्टिस कौल के संस्मरण से क्यों गरमाई सियासत?
जस्टिस संजय किशन कौल ने अपने संस्मरण में न्यायाधीशों की नियुक्ति और कॉलेजियम की बैठकों से जुड़े कुछ प्रसंगों का उल्लेख किया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए इन घटनाओं को न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिहाज से चिंताजनक बताया।
रमेश के अनुसार, नियुक्तियों से पहले सरकार की सहमति लेने की कोशिश और एक अल्पसंख्यक समुदाय के उम्मीदवार के परिवार की जाति से संबंधित पूछताछ जैसे प्रसंग संस्थागत स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करते हैं।
कांग्रेस नेता ने इस मुद्दे को लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता से जोड़ते हुए कहा कि न्यायपालिका को सत्ता के दबाव से मुक्त रखना आवश्यक है। हालांकि, ये टिप्पणियां जयराम रमेश की राजनीतिक प्रतिक्रिया का हिस्सा हैं।
नियुक्तियों से पहले सरकारी सहमति का मुद्दा
द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस कौल ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के साथ न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर हुए मतभेदों का जिक्र किया है।
कौल के मुताबिक, कुछ मौकों पर कॉलेजियम की औपचारिक बैठक से पहले सरकार की सहमति लेने का मुद्दा उठा था। उन्होंने परामर्श लेने और पहले से मंजूरी प्राप्त करने के बीच अंतर पर जोर दिया।
इस प्रसंग में मुख्य सवाल यह है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति पर विचार करते समय सरकार के साथ संवाद की सीमा क्या होनी चाहिए। यदि औपचारिक विचार-विमर्श से पहले ही किसी नाम पर सहमति को निर्णायक माना जाने लगे, तो कॉलेजियम की स्वतंत्र निर्णय प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है।
हालांकि, संस्मरण में दर्ज घटनाक्रम और संबंधित पक्षों के पूरे संदर्भ सामने आने के बाद ही इस विवाद का व्यापक आकलन किया जा सकता है।
उम्मीदवार की जाति से जुड़े सवाल पर जताई आपत्ति
जस्टिस कौल ने अपने संस्मरण में एक अल्पसंख्यक समुदाय के न्यायाधीश पद के उम्मीदवार से संबंधित प्रसंग भी साझा किया है। उनके अनुसार, उम्मीदवार के परिवार की जाति को लेकर पूछताछ की गई थी, जिस पर उन्होंने आपत्ति जताई।
कौल के मुताबिक, इस मुद्दे पर असहमति बढ़ने के बाद उन्होंने एक बैठक छोड़ दी थी। उन्होंने यह भी बताया कि बाद में सरकार ने संबंधित उम्मीदवार की नियुक्ति पर सहमति दे दी।
यह प्रसंग न्यायाधीशों की नियुक्ति में उम्मीदवार की योग्यता, सामाजिक पृष्ठभूमि और संस्थागत प्रक्रियाओं की भूमिका को लेकर सवाल उठाता है। हालांकि, इस मामले में उपलब्ध जानकारी जस्टिस कौल के संस्मरण में दर्ज विवरण पर आधारित है।
पीएमएलए मामले में पीठ बदलने पर भी सवाल
जस्टिस कौल ने धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) से जुड़े एक मामले का उल्लेख करते हुए पीठ बदलने की प्रक्रिया पर भी चिंता जताई है।
उनके अनुसार, उनकी अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने पहले के फैसले के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार के प्रश्न को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था। बाद में मामला दूसरी पीठ के सामने पहुंच गया।
कौल ने इस घटनाक्रम के संदर्भ में सवाल उठाया कि किसी संभावित फैसले को लेकर आशंकाओं के कारण मामले को दूसरी पीठ में नहीं भेजा जाना चाहिए।
यह मुद्दा न्यायिक प्रक्रिया में मामलों के आवंटन और पीठों के गठन की निष्पक्षता से जुड़ा है। हालांकि, इस घटनाक्रम के सभी पहलुओं की स्वतंत्र पुष्टि के बिना किसी अनियमितता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने क्या कहा?
द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि उन्होंने जस्टिस कौल का संस्मरण नहीं पढ़ा है, इसलिए उसमें दर्ज संदर्भों पर विस्तृत प्रतिक्रिया देना उनके लिए मुश्किल है।
उन्होंने कॉलेजियम की बैठकों को सौहार्दपूर्ण बताते हुए कहा कि उन्हें जस्टिस कौल के बैठक छोड़कर जाने की घटना याद नहीं है।
चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में सरकार की भूमिका होती है और नियुक्ति के वारंट पर राष्ट्रपति हस्ताक्षर करते हैं।
उनकी प्रतिक्रिया के बाद नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार और कॉलेजियम की भूमिकाओं को लेकर बहस और महत्वपूर्ण हो गई है। इस मामले में दोनों पक्षों के बयानों और संबंधित दस्तावेजों को साथ रखकर देखना जरूरी है।
क्या है सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम व्यवस्था?
कॉलेजियम व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा स्थानांतरण से जुड़े नामों पर वरिष्ठ न्यायाधीशों का समूह विचार करता है। इस व्यवस्था में न्यायपालिका की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, जबकि नियुक्ति की संवैधानिक प्रक्रिया में सरकार और राष्ट्रपति की भी भूमिका रहती है।
वर्ष 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) से संबंधित संवैधानिक संशोधन और कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इसके बाद कॉलेजियम व्यवस्था बरकरार रही।
जस्टिस कौल ने अपने संस्मरण में एनजेएसी को एक अवसर दिए जाने की वकालत करने के साथ कॉलेजियम की अपारदर्शिता और उसमें सत्ता के केंद्रीकरण से जुड़ी चिंताएं भी व्यक्त की हैं।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर बहस
जस्टिस कौल के संस्मरण से जुड़े इन प्रसंगों ने न्यायाधीशों की नियुक्ति और न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर चर्चा को फिर तेज कर दिया है। एक ओर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है, वहीं दूसरी ओर नियुक्ति व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जरूरत पर भी सवाल उठते रहे हैं।
फिलहाल इस घटनाक्रम में जस्टिस कौल के संस्मरण में दर्ज विवरण, जयराम रमेश की प्रतिक्रिया और जस्टिस चंद्रचूड़ का पक्ष सामने आया है। अब इस विषय पर आगे होने वाली प्रतिक्रियाओं और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही तस्वीर अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

